Tuesday, November 13, 2018

श्रद्धा और समर्पण

एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है। वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी। वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा। दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया। घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई। वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया। तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था। उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम हुई थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे। वह गाय उस किचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी। वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका। वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धंसने लगा। दोनों भी करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फस गए। दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था। 

थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा, क्या तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है? 


बाघ ने गुर्राते हुए कहा, मैं तो जंगल का राजा हूं। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं। 


गाय ने कहा, लेकिन तुम्हारे उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है?
उस बाघ ने कहा, तुम भी तो फस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी है।


गाय ने मुस्कुराते हुए कहा, बिलकुल नहीं। मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढते हुए यहां जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जाएगा। तुम्हें कौन ले जाएगा?


थोड़ी ही देर में सच में ही एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया। जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था।


गाय समर्पित ह्रदय का प्रतीक है। बाघ अहंकारी मन है और मालिक सद्गुरु का प्रतीक है। कीचड़ यह संसार है। और यह संघर्ष अस्तित्व की लड़ाई है। किसी पर निर्भर नहीं होना अच्छी बात है लेकिन उसकी अति नहीं होनी चाहिए। आपको किसी मित्र,किसी गुरु, किसी सहयोगी की हमेशा ही जरूरत होती है।

अज्ञानता क्या है ?? ब्रह्मचारी और अविवाहित में अंतर क्या है ??

अपनी चर्चा की सुरुवात हम लोग एक कहानी, एक प्रकरण से करते है

बात उस समय कि है  जब कृष्ण , अपनी ढेर सारी रानियों  और ढेर सारे बच्चों के साथ में  द्वारका में रह रहे थे..... एक दिन कान्हा की सब रानियां , कान्हा के पास आई और बोली कि सुना है कि हमारे नगर में दुर्वाषा  ऋषि जी आये है, हम सब लोग उनका दर्शन करने के लिये जाना चाहती है, आपसे अनुमति लेने आये है .... कान्हा ने कहा -- ठीक है, आप लोग जा सकती है...तो रानियां बोली कि  दुर्वाषा जी नदी के उस पार जंगल मे आये है, हम लोग नदी पार कैसे करेंगे ??  हमारी संख्या इतनी है कि इतनी जल्दी , इतनी नाव की व्यवस्था भी नही हो सकती है...तो कान्हा ने कहा कि आप सब लोग, नदी तट पर जाना  और  नदी से कहना कि --

हे नदी देवी, यदि कृष्ण ने जीवन भर ब्रह्मचर्य  और सन्यास का पालन किया हो तो , कृपया आप हमें मार्ग दे दो..... जैसे ही कृष्ण ने ये कहा ,  पत्नी स्वभाव के कारण , सभी रानियां जोर जोर से हँसते हुए बोली कि -- इतनी रानियों से विवाह करने के बाद, इतने ढेरो बच्चे पैदा करने के बाद भी आप कह रहे हो कि आपने जीवन भर ब्रह्मचर्य  और  सन्यास का पालन किया है ?? 😳😳😳 ये क्या मजाक कर रहे हो ....कान्हा ने मुस्कुराते हुए कहा कि देवियों , आप लोग नदी तट पर जा कर कहना तो.....सत्य सत्य ही होता है, उसे साबित करने की जरूरत नही होती है...

सब रानियां, नदी तट पर पहुँची और एक साथ बोली कि हे नदी देवी, यदि कृष्ण ने आजीवन ब्रह्मचर्य और सन्यास का पालन किया हो तो आप हमें मार्ग दे दो....इतना कहते ही, नदी में पीछे से आने वाला पानी रुक गया, और वहां का पानी आगे बह गया,  नदी खाली हो गयी, ये नजारा देखकर सब रानियों को बहुत आश्चर्य हुवा, उसी आश्चर्य की अवस्था मे ही उन सभी ने नदी पार कर ली, रानियां जैसे ही नदी के उस पार पहुँची, नदी का प्रवाह फिर चालू हो गया....दुर्वाषा जी के पास पहुँची, सभी ने दुर्वाषा जी के चरण स्पर्श किये, आशीर्वाद लिया  और सभी रानियों ने एक एक कटोरी खीर दुर्वाषा जी को भेंट करी,  दुर्वाषा जी ने सभी से थोड़ा थोड़ा खा लिया...फिर वापस जाने के लिये, सभी रानियों ने दुर्वाषा जी से अनुमति मांगी, और नदी पार करने की समस्या रखी तो दुर्वाषा जी बोले कि आप सभी लोग नदी तट पर जाना  और नदी से कहना कि --  हे नदी देवी,  यदि दुर्वाषा ऋषि ने आजीवन उपवास और अक्रोध  का पालन किया हो तो कृपया आप हमें मार्ग दे दो...अब फिर सब रानियों का दिमाग चकराया कि ये क्या बोल रहे है ???  इतने कटोरे खीर खा गए दुर्वाषा जी , और कह रहे है कि आजीवन उपवास  का निर्वाह ???  क्रोध में आ कर किसी को भी श्राप दे देने के लिए तो दुर्वाषा जी विश्व विख्यात है,  और कह रहे है कि आजीवन अक्रोध का निर्वाह ??

रानियों को कुछ समझ नही आ रहा था....भय के कारण , दुर्वाषा जी से कुछ कहने पूछने की हिम्मत भी नही हुई...सब रानियां, नदी तट पर पहुँची और फिर एक साथ बोली कि  हे नदी देवी,  यदि दुर्वाषा ऋषि ने आजीवन उपवास, आजीवन अक्रोध का पालन किया हो तो कृपया आप हमें मार्ग दे दो...इतना कहते ही, नदी एक बार फिर खाली हो गई, सब रानियां पार हुई,  नदी का प्रवाह फिर चालू हो गया....अब तो सारी रानियां , सीधे कान्हा के पास पहुँची, और बोली कि -- महाराज, ये सब क्या है ??  इतनी रानियों से विवाह करने के बाद, इतने बच्चे पैदा करने के बाद,  आप कहते हो कि  आपने आजीवन ब्रह्मचर्य और सन्यास  का पालन किया ???...... और दुर्वाषा जी इतनी सारी खीर खा गए,  और कहते है कि आजीवन उपवास का निर्वाह किया है ???  क्रोध में आकर तो किसी को भी श्राप दे देने के लिये तो वो विश्व विख्यात है,  और कह रहे है कि मैंने आजीवन अक्रोध का निर्वाह किया है ???.... और ये चारों तत्थ ,  चारो निवेदन  सत्य है, इसका हम सब लोग साक्छात  प्रमाण देख कर आ रहे है .... ये सब मामला क्या है ???  हमे तो बहुत आश्चर्य हो रहा है....

तब कान्हा ने  मुस्कुराते  हुए  कहा  कि  देवियों, ये अस्तित्व, ये प्रकृति, सिर्फ उन्ही परिभाषा पर चलती है जो वास्तव में सत्य है, इस संसार मे मैक्सिमम लोगो के पास वो नजर ही नही है जो सत्य को देख सके, वास्तविकता को देख सके....कोई भी मनुष्य , विभिन्न सब्दो की वास्तविक परिभाषा तब तक  जान नही सकता, सत्य देख नही सकता , जब तक कि वो किसी किसी करुणा से भरे साधु की शरण मे नही चला जाता है, बिना सत्संग सभी मनुष्यों का जीवन सिर्फ भृम में गुजर जाता है...

ये जो घटना है, क्या ये सिर्फ कहानी है ??

नही...

 हम लोग जिस समाज में जी रहे हैं,  यहां पर बहुत भ्रम है , बिना कथा श्रवण , बिना मजबूत भजन,  हमारा पूरा जीवन सिर्फ भ्रम में , संशय में,  गुस्साते , चिड़चिड़ाते ही निकल जाता है, हमें जीवन भर   पता ही नहीं चलता है कि हम दुखी क्यों हैं ??  जब तक  कि  हम कथा रूप कान्हा , भजन रुप कान्हा का संग नहीं कर लेते हैं

नहीं तो हमारा पूरा जीवन सिर्फ भ्रम में ही गुजर जाता है

हम शादी नहीं करते हैं तो अपने आप को ब्रह्मचारी मान लेते हैं

 शादी कर लेते हैं तो अपने आप को  ग्रहस्थ  मान लेते हैं

घर की समस्याओं के कारण , घर छोड़ कर भाग गए , वस्त्र बदल लिए , सिर के बाल साफ कर लिए तो अपने आप को  वानप्रस्थी  और सन्यासी मान लेते हैं

 जबकि बिना कथा श्रवण , बिना भजन,  हम लोग सिर्फ अविवाहित , विवाहित ,  भगोड़े , या  भिखारी हो सकते हैं .....,ब्रह्मचारी,  गृहस्थ, वानप्रस्थी  या सन्यासी नहीं हो सकते हैं , इसी भ्रम को अज्ञानता कहते हैं

 अज्ञानता शब्द को लेकर भी हम लोग भ्रम में ही होते हैं

बिना कथा श्रवण, बिना मजबूत भजन के, हम लोग क्या मानते है ??

यदि कोई व्यक्ति किसी विषय के बारे में कुछ नहीं जानता है तो हम लोग उस व्यक्ति को अज्ञानी कह देते हैं जबकि ऐसा नहीं है

 यदि कोई व्यक्ति किसी विषय में कुछ भी नहीं जानता है तो उस व्यक्ति  को अनजान कहा जाएगा ,  अनभिज्ञ कहा जायेगा ... ...अज्ञानी नही ....

कम जानने वाले को -- अल्पज्ञ

सब कुछ जानने वाले को -- सर्वज्ञ

जिसे कुछ भी पता नहीं है उसे अज्ञानी नहीं कहा जाता है बल्कि अज्ञानी उसे कहा जाता है , जो इस अहंकार में जी रहा है कि मुझे सब कुछ आता है, उस अहंकार को ही अज्ञान कहते है

अज्ञान -- यानी जहाँ ज्ञान न हो

फिर ज्ञान किसे कहते है ??

रामचरित मानस में ज्ञान की एक परिभाषा --

ग्यान मान जह एकउ नाही

यानी ज्ञान उस अवस्था को कहते है , जहाँ पर किसी से भी, किसी भी प्रकार के मान (सम्मान) की चाहत न बचे ...

अहंकार मुक्त अवस्था को ही ज्ञान कहते है,
कान्हा  भजन, कान्हा प्रेम का अनुभव इतना हो गया कि लोक प्रसंसा की चाहत ही खत्म हो गयी, ऐसी अवस्था को ही ज्ञान कहा गया है

यानी

जब तक हमारे अंदर लोक प्रसंसा पाने की चाहत है, लोगो से बात करने की चाहत स्ट्रांग है, फेसबुक सोशल मीडिया पर मिलने वाले लाइक, कमेंट अच्छे लग रहे है, लोगो से चैटिंग  करके , बात करके मजा आ रहा है, उसमे रस  आ रहा है, लोक निन्दा का रस हमे मिल रहा है, हम लोग बहस करके खुद को सही साबित करने में जुटे है,  लोगो पर आरोप लगा कर अपने अहंकार को पोषित कर रहे है, झूठे अभिमान का सुख ले रहे है तो हम  इस प्रकृति की नजर में  अज्ञानी ही है,  फिर इस बात से कोई फर्क नही पड़ता है कि हम शास्त्र की बहुत अच्छी व्याख्या करके लोगो को प्रभावित कर लेते है,  दुनियां हमे ज्ञानी, सत्संगी, भक्त मान लेगी, उसकी प्रसंसा भी मिल जाएगी ...परन्तु  हम वास्तव में अज्ञानी ही है प्रकृति की नजर में ....

यदि हमारा भजन मजबूत नही हुवा, भजन की मग्नता का सुख मन को नही मिला तो धर्म छेत्र में आकर भी हम लोक प्रसंसा में फँस जाते है, दुनिया की नजर में  धार्मिक सत्संगी ज्ञानी भक्त कहलाने की प्रसंसा में फँस जाते है, खुद को सत्संगी मान कर झूठे अभिमान का सुख लेने लगते है...ये धार्मिक, सत्संगी, भक्त होने का, सतोगुणी अहंकार तो सबसे खतरनाक है....बाकी के तमोगुणी, रजोगुणी अहंकार को तोड़ना तो फिर भी आसान है, कुछ घटनावो के माध्यम से प्रकृति ये कार्य कर सकती है....परन्तु धर्म छेत्र में आकर यदि  हमे ये सतोगुणी अहंकार पकड़ लिया  तो फिर इससे बाहर आना बहुत ही मुश्किल और जटिल कार्य है...

अज्ञानता  -- यानी झूठे अभिमान का सुख

इसकी जड़ें बहुत गहरी है हमारे वजूद में, हमारा मन जन्मों जन्मों से इसी की प्रैक्टिस करता आया है,

हमारे दुख का कारण हमारा मन नही है बल्कि   सिर्फ वो मन है जिसे झूठे अभिमान के सुख की लत लग चुकी है  (यानी काला कुत्ता ) क्योकि हमने इस  काले कुत्ते को  कुसंग की रोटी, बोटी, बहुत खिलाई है ...... ये काला कुत्ता हमे सत्य देखने ही नही देता है


महाभारत में एक प्रकरण है कि  पांडवों ने अपने  राज्य इंद्रप्रस्थ में एक महल का निर्माण किया था ,  जिस महल में दुर्योधन जाता है और उसे , उस महल में जल का थल में  और  थल का जल में भ्रम होता है इसलिए जहां पर पानी था,  वहां पर वह जमीन समझकर पैर रखता है और पानी में गिर जाता है ,  दुर्योधन को पानी में गिरते हुए द्रौपदी देखती है और हंस देती है और उस समय द्रौपदी कहती है  कि अंधे का पुत्र अंधा ...... जिसके बाद दुर्योधन को बहुत गुस्सा आता है और उसके अहंकार को बहुत चोट पड़ती है और वो द्रोपदी  से बदला लेने को ठान  लेता है....

कोई भी शास्त्र बहुत सारे अर्थों में लिखे जाते हैं , कहानी के रूप में भी वह हमें बहुत सारी शिक्षा देते हैं  और  तत्व ज्ञान के रूप में भी ....

धृतराष्ट्र  --  यानी अंधा राष्ट्र ,  यानी  हमारे  समाज के  मैक्सिमम  लोग जिन्होंने कभी सत्य का, वास्तविकता का , ज्ञान का,  प्रकाश  कभी देखा ही नही है .....जैसे धृतराष्ट्र व्यक्ति के रूप में जन्म से ही अंधा था

गांधारी  -- यानी  हमारे समाज के वो बुद्धिजीवी लोग , जिनके पास काफी समय तक नजर थी, जीवन को परखने की , देखने की ....परन्तु  समय के साथ साथ मिली लोक प्रसंसा  और सत्संग के अभाव ने  उनकी प्रतिभा को भी खोखला कर दिया .... लोक प्रसंसा पाने के स्वार्थ की पट्टी उनकी आँखों मे भी बंध गयी

इस धृतराष्ट  +  गांधारी  =  यानी कुसंग ने  हमारे अंदर  द्रोयोधन को पैदा कर दिया .....

द्रोयोधन  --  यानी  कुसंग के कारण, सत्संग के अभाव  में,  हमारे अंदर उत्पन्न हुई ढेरो  दुरवृत्तिया ,  दूरभावनाएं, खुद को सर्वज्ञ मान लेने का अहंकार , झूठे अभिमान के सुख का व्यसनी मन .....व्यक्ति के रूप में जैसे द्रोयोधन बहुत अहंकारी है, किसी की सुनता नही है....

पाँच तत्वों से बना हमारा शरीर -- पाण्डव

द्रोपदी -- हमारी चेतना

ये दुनिया वो इंद्रप्रस्थ का महल ही है , जहाँ पर हमारे अहंकारी मन को, झूठे अभिमान के व्यसनी मन को, यानी हमारे अंदर के  द्रोयोधन को सब कुछ उल्टा ही दिखता है ....जैसे व्यक्ति के रूप में द्रोयोधन को दिखता है, जहाँ पानी था वहाँ जमीन दिखती है, जहाँ जमीन थी वहाँ पानी दिखता है ...

झूठे अभिमान का व्यसनी हमारा मन, यानी द्रोयोधन ही सारे दुष्कर्म करता है अपनी अज्ञानता में, अपने अहंकार में .... और फिर उन दुष्कर्मो का जो परिणाम आता है, जो पश्चाताप की भयंकर पीड़ा होती है , वो पीड़ा कभी भी द्रोयोधन को नही होती है , बल्कि हमारी चेतना (द्रोपदी) को होती है.... उस पश्चाताप के दर्द से जब हमारी चेतना (द्रोपदी) चिल्लाती है  तो उसके पाँच पति (पाण्डव) यानी पंच तत्व से बना हमारा सरीर उसकी कोई हेल्प सहायता नही कर पाता .... उस समय द्रोपदी (हमारी चेतना) की हेल्प सिर्फ एक ही शख्स करता है -- कान्हा

यानी कान्हा का रूप, कान्हा  का स्मरण, कान्हा की कथा, कान्हा का भजन ....

बाकी चर्चा अगले अंकों  में करेंगे, इस अज्ञान को और अधिक समझने का प्रयास करेंगे, और समझने का प्रयास करेंगे कि वास्तव में ब्रह्मचर्य, ग्रहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास क्या है ?? प्रकृति के अनुसार, कान्हा के अनुसार ....

वास्तविक उपवास, वास्तविक अक्रोध की चर्चा तो हम लोग पिछले पोस्टो में कर चुके है....

कान्हा प्रिय हो
प्रेम प्रिय हो

भक्त_सखुबाई

महाराष्ट्र में कृष्णा नदी के किनारे करहाड़ नामक एक स्थान है, वहाँ एक ब्राह्मण रहता था

उसके घर में चार प्राणी थे- ब्राह्मण, उसकी स्त्री, पुत्र और साध्वी पुत्रवधू।

ब्राह्मण की पुत्रवधू का नाम था ‘सखूबाई’।

सखूबाई जितनी अधिक भक्त, आज्ञा कारिणी, सुशील, नम्र और सरल हृदय थी उसकी सास उतनी ही अधिक दुष्टा, अभिमानी, कुटिला और कठोर हृदय थी।

पति व पुत्र भी उसी के स्वभाव का अनुसरण करते थे।

सखूबाई सुबह से लेकर रात तक बिना थके-हारे घर केे सारे काम करती थी।

शरीर की शक्ति से अधिक कार्य करने के कारण अस्वस्थ रहती, फिर भी वह आलस्य का अनुभव न करके इसे ही अपना कर्तव्य समझती।

मन ही मन भगवान् के त्रिभुवन स्वरूप का अखण्ड ध्यान और केशव, विठ्ठल, कृष्ण गोविन्द नामों का स्मरण करती रहती।

दिन भर काम करने के बाद भी उसे सास की गालियाँ और लात-घूंसे सहन करने पड़ते।

पति के सामने दो बूँद आँसू निकालकर हृदय को शीतल करना उसके नसीब में ही नहीं था।

कभी-कभी बिना कुसूर के मार गालियों की बौछार उसके हृदय में शूल की तरह चुभती थी

परन्तु अपने शील स्वभाव के कारण वह सब बातें पल में ही भूल जाती।

इतना होने पर भी वह इस दुःख को भगवान् का आशीर्वाद समझकर प्रसन्न रहती और सदा कृतज्ञता प्रकट करती कि मेरे प्रभु की मुझ पर विशेष कृपा है

जो मुझे ऐसा परिवार दिया वरना सुखों के बीच में रहकर मैं उन्हें भूल जाती और मोह वश माया जाल में फँस जाती।

एक दिन एक पड़ोसिन ने उसकी ऐसी दशा को देखकर कहा- ‘‘क्या तेरे नेहर में कोई नहीं है जो तेरी खोज ख़बर ले’।

उसने कहा ‘‘मेरा नेहर पण्ढ़रपुर है, मेरे माँ-बाप रुक्मिणी-कृष्ण हैं।

एक दिन वे मुझे अपने पास बुलाकर मेरा दुःख दूर करेंगे।’’

सखूबाई घर के काम ख़त्म कर कृष्णा नदी से पानी भरने गयी, तभी उसने देखा कि भक्तों के दल नाम-संकीर्तन करते हुए पण्ढ़रपुर जा रहे हैं

एकादशी के दिन वहाँ बड़ा भारी मेला लगता है।

उसकी भी पण्ढ़रपुर जाने की प्रबल इच्छा हुई पर घरवालों से आज्ञा का मिलना असम्भव जान कर वह इस संत मण्डली के साथ चल दी।

यह बात एक पड़ोसिन ने उसकी सास को बता दी।

माँ के कहने पर पुत्र घसीटते हुए सखू को घर ले आया और उसे रस्सी से बाँध दिया,

परन्तु सखू का मन तो प्रभु के चरणों में ही लगा रहा।

वह प्रभु से रो-रोकर दिन-रात प्रार्थना करती रही, क्या मेरे नेत्र आपके दर्शन के बिना ही रह जायेंगे ?

कृपा करो नाथ ! मैंने अपने को तुम्हारे चरणों मे बाँधना चाहा था, परन्तु बीच में यह नया बंधन कैसे हो गया ?

मुझे मरने का डर नहीं है पर सिर्फ़ एक बार आपके दर्शन की इच्छा है।

मेरे तो माँ-बाप, भाई, इष्ट-मित्र सब कुछ आप ही हो , मैं भली-बुरी जैसी भी हूँ, तुम्हारी हूँ।

सच्ची पुकार को भगवान् अवश्य सुनते हैं और नकली प्रार्थना का जवाब नहीं देते।

असली पुकार चाहे धीमी हो, वह उनके कानों तक पहुँच जाती है।

सखू की पुकार को सुनकर भगवान् एक स्त्री का रूप धारण कर उसके पास आकर बोले-

मैं तेरी जगह बँध जाऊँगी, तू चिन्ता मत कर।

यह कहकर उन्होंने सखू के बंधन खोल दिये और उसे पण्ढ़रपुर पहुँचा दिया।

इधर सास-ससुर रोज़ उसके पास जाकर खरी-खोटी सुनाते, वे सब सह जाती।

जिनके नाम स्मरण मात्र से माया के दृढ़ बन्धन टूट जाते हैं, वे भक्त के लिए सारे बंधन स्वीकार करते हैं।

आज सखू बने भगवान् को बँधे दो हफ्ते हो गये

उसकी ऐसी दशा देखकर पति का हृदय पसीज गया। उसने सखू से क्षमा माँगी और स्नान कर भोजन के लिए कहा। आज प्रभु के हाथ का भेाजन कर सबके पाप धुल गये।

उधर सखू यह भूल गयी कि उसकी जगह दूसरी स्त्री बँधी है। उसका मन वहाँ ऐसा लगा कि उसने प्रतिज्ञा की कि शरीर में जब तक प्राण हैं, वह पण्ढ़रपुर में ही रहेगी।

प्रभु के ध्यान में उसकी समाधि लग गयी और शरीर अचेत हो ज़मीन पर गिर पड़ा। गाँव के लोगों ने उसका अंतिम संस्कार कर दिया

माता रुक्मिणी को चिन्ता हुई कि मेरे स्वामी सखू की जगह पर बहू बने हैं।

उन्होंने शमशान पहुँचकर सखू की अस्थियों को एकत्रित कर उसे जीवित किया और सब स्मरण कराकर करहड़ जाने की आज्ञा दी।

करहड़ पहुँचकर जब वह स्त्री बने प्रभु से मिली तो उसने क्षमा-याचना की।

जब घर पहुँची तो सास-ससुर के स्वभाव में परिवर्तन देखकर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ।

दूसरे दिन एक ब्राह्मण सखू के मरने का समा चार सुनाने करहड़ आया और सखू को काम करते देख उसे बड़ा आश्चर्य हुआ।

उसने सखू के ससुर से कहा- ‘‘तुम्हारी बहू तो पण्ढ़रपुर में मर चुकी थी।

पति ने कहा- ’’सखू तो पण्ढ़रपुर गयी ही नहीं, तुम भूल से ऐसा कहते हो।

जब सखू से पूछा तो उसने सारी घटना सुना दी। सभी को अपने कुकृत्यों पर पश्चाताप हुआ।

अब सब कहने लगे कि निश्चित ही वे साक्षात् लक्ष्मीपति थे, हम बड़े ही नीच और भक्ति हीन हैं।

हमने उनको न पहचानकर व्यर्थ ही बाँधे रखा और उन्हें न मालूम कितने क्लेश दिये।

अब तीनों के हृदय शुद्ध हो चुके थे और उन्होंने सारा जीवन प्रभु भक्ति में लगा दिया।

प्रभु अपने भक्तों के लिए क्या कुछ नहीं करते।
......

बहुत छोटी सी कहानी

मैं एक गृह प्रवेश की पूजा में गया। पंडित जी पूजा करा रहे थे।

पंडित जी ने सबको हवन में शामिल होने के लिए बुलाया। सबके सामने हवन सामग्री रख दी गई। पंडित जी मंत्र पढ़ते और कहते, “स्वाहा।”

लोग चुटकियों से हवन सामग्री लेकर अग्नि में डाल देते। गृह मालिक को स्वाहा कहते ही अग्नि में घी डालने की ज़िम्मेदीरी सौंपी गई।

हर व्यक्ति थोड़ी सामग्री डालता, इस आशंका में कि कहीं हवन खत्म होने से पहले ही सामग्री खत्म न हो जाए। गृह मालिक भी बूंद-बूंद घी डाल रहे थे। उनके मन में भी डर था कि घी खत्म न हो जाए।

मंत्रोच्चार चलता रहा, स्वाहा होता रहा और पूजा पूरी हो गई।
सबके पास बहुत सी हवन सामग्री बची रह गई। घी तो आधा से भी कम इस्तेमाल हुआ था।

हवन पूरा होने के बाद पंडित जी ने कहा कि आप लोगों के पास जितनी सामग्री बची है, उसे  अग्नि में डाल दें। गृह स्वामी से भी उन्होंने कहा कि आप इस घी को भी कुंड में डाल दें।

एक साथ बहुत सी हवन सामग्री अग्नि में डाल दी गई। सारा घी भी अग्नि के हवाले कर दिया गया। पूरा घर धुंए से भर गया। वहां बैठना मुश्किल हो गया।
एक-एक कर सभी कमरे से बाहर निकल गए।

अब जब तक सब कुछ जल नहीं जाता, कमरे में जाना संभव नहीं था।काफी देर तक इंतज़ार करना पडा, सब कुछ स्वाहा होने के इंतज़ार में।

मेरी कहानी यहीं रुक जाती है।

उस पूजा में मौजूद हर व्यक्ति जानता था कि जितनी हवन सामग्री उसके पास है, उसे हवन कुंड में ही डालना है। पर सबने उसे बचाए रखा। सबने बचाए रखा कि आख़िर में सामग्री काम आएगी।

ऐसा ही हम करते हैं। यही हमारी फितरत है। हम अंत के लिए बहुत कुछ बचाए रखते हैं।

ज़िंदगी की पूजा खत्म हो जाती है और हवन सामग्री बची रह जाती है। हम बचाने में इतने खो जाते हैं कि जब सब कुछ होना हवन कुंड के हवाले है, उसे बचा कर क्या करना। बाद में तो वो सिर्फ धुंआ ही देगा।

संसार हवन कुंड है और जीवन पूजा। एक दिन सब कुछ हवन कुंड में समाहित होना है। अच्छी पूजा वही है, जिसमें हवन सामग्री का सही अनुपात में इस्तेमाल हो l

चन्दन का बाग

सुनसान जंगल में एक लकड़हारे से पानी पी कर प्रसन्न हुआ राजा कहने लगा― हे पानी पिलाने वाले ! किसी दिन मेरी राजधानी में अवश्य आना, मैं तुम्हें पुरस्कार दूँगा, लकड़हारे ने कहा―बहुत अच्छा। इस घटना को घटे पर्याप्त समय व्यतीत हो गया, अन्ततः लकड़हारा एक दिन चलता-फिरता राजधानी में जा पहुँचा और राजा के पास जाकर कहने लगा―

मैं वही लकड़हारा हूँ, जिसने आपको पानी पिलाया था,

राजा ने उसे देखा और अत्यन्त प्रसन्नता से अपने पास बिठाकर सोचने लगा कि- इस निर्धन का दुःख कैसे दूर करुँ ?

अन्ततः उसने सोच-विचार के पश्चात् चन्दन का एक विशाल उद्यान (बाग) उसको सौंप दिया।

लकड़हारा भी मन में प्रसन्न हो गया। चलो अच्छा हुआ। इस बाग के वृक्षों के कोयले खूब होंगे, जीवन कट जाएगा।

यह सोचकर लकड़हारा प्रतिदिन चन्दन काट-काटकर कोयले बनाने लगा और उन्हें बेचकर अपना पेट पालने लगा।

थोड़े समय में ही चन्दन का सुन्दर बगीचा एक वीरान बन गया, जिसमें स्थान-स्थान पर कोयले के ढेर लगे थे। इसमें अब केवल कुछ ही वृक्ष रह गये थे, जो लकड़हारे के लिए छाया का काम देते थे।

राजा को एक दिन यूँ ही विचार आया। चलो, तनिक लकड़हारे का हाल देख आएँ। चन्दन के उद्यान का भ्रमण भी हो जाएगा। यह सोचकर राजा चन्दन के उद्यान की और जा निकला।

उसने दूर से उद्यान से धुआँ उठते देखा। निकट आने पर ज्ञात हुआ कि चन्दन जल रहा है और लकड़हारा पास खड़ा है।

दूर से राजा को आते देखकर लकड़हारा उसके स्वागत के लिए आगे बढ़ा।

राजा ने आते ही कहा― भाई ! यह तूने क्या किया ?

लकड़हारा बोला― आपकी कृपा से इतना समय आराम से कट गया। आपने यह उद्यान देकर मेरा बड़ा कल्याण किया।

कोयला बना-बनाकर बेचता रहा हूँ। अब तो कुछ ही वृक्ष रह गये हैं। यदि कोई और उद्यान मिल जाए तो शेष जीवन भी व्यतीत हो जाए।

राजा मुस्कुराया और कहा― अच्छा, मैं यहाँ खड़ा होता हूँ। तुम कोयला नहीं, प्रत्युत इस लकड़ी को ले-जाकर बाजार में बेच आओ।

लकड़हारे ने दो गज [ लगभग पौने दो मीटर ] की लकड़ी उठाई और बाजार में ले गया।

लोग चन्दन देखकर दौड़े और अन्ततः उसे तीन सौ रुपये मिल गये, जो कोयले से कई गुना ज्यादा थे।

लकड़हारा मूल्य लेकर रोता हुआ राजा के पास आय और जोर-जोर से रोता हुआ अपनी भाग्यहीनता स्वीकार करने लगा।

इस कथा में चन्दन का बाग मनुष्य का शरीर और हमारा एक-एक स्वास चन्दन के वृक्ष हैं पर अज्ञानता वश हम इन चन्दन को कोयले में तब्दील कर रहे हैं।

स्वजनों क्यूँ लोगों के साथ बैर, द्वेष, क्रोध, लालच, ईर्ष्या, मनमुटाव, को लेकर खिंच-तान आदि की अग्नि में हम इस जीवन रूपी चन्दन को जला रहे हैं।

जब अंत में स्वास रूपी चन्दन के पेड़ कम रह जायेंगे तब आपको अहसास होगा कि व्यर्थ ही अनमोल चन्दन को इन तुच्छ कारणों से हम दो कौड़ी के कोयले में बदल रहे थे,

भक्तजनो  अभी भी देर नहीं हुई है हमारे पास जो भी चन्दन के पेड़ बचे है उन्ही से नए पेड़ बन सकते हैं।

स्वजनों आपसी प्रेम, सहायता, सौहार्द, शांति, भाईचारा, और विश्वास, के द्वारा अभी भी जीवन सँवारा जा सकता हैं।

✍लेख जन जागृति के लिए साझा अवश्य करें!

शुभ प्रभात।आज का दिन आपके लिये शुभ एवं मंगलमय हो।

ईश्वर भक्ति

ईश्वर की भक्ति हमे अद्भुत शक्ति देती हैं क्योकि हमारे मन के विकार दूर हो जाते हैं और मन शांत और सरल हो जाता हैं। हम अपने समय और धन को अच्छे कार्यो में लगाते हैं जिससे हमे जीवन में सफलता और ख़ुशी मिलती हैं।ईश्वर इस जगत के कण-कण में हैं, वो सदा हमारे पास, हमारे साथ दुःख-सुख में रहते हैं।जब भी आपके मन में बुरे ख्याल या किसी के प्रति घृणा आ रहा हो तो अपने मन को ईश्वर की चरणों में लगाएँ।ऐसे विकार केवल ईश्वर के मनन से ही दूर हो जाता हैं और आप अपनी शक्ति और समय का उपयोग किसी अच्छे कार्य की लिए कर सकते है

✍🏻भगवान के बारे मे  कुछ  किताबे  पढ़ने  से या किसी गुरू के आशीर्वाद से ईश्वर और उनकी महिमा को नही समझा जा सकता हैं, यह केवल एक अनुभूति होती हैं जिसे शब्दों में बयाँ नही किया जा सकता हैं। इसे आपको को खुद अनुभव करना पड़ता हैं।

✍🏻भगवान से कुछ माँगने पर न मिले तो उनसे नाराज मत होना क्योकि भगवान वह नही देते जो आपको अच्छा लगता हो बल्कि वह देते हैं जो आपके लिए अच्छा होता हैं। 


✍🏻ईश्वर पर आप तभी विश्वास कर सकते हैं जब आपको खुद पर विश्वास हो क्योकि ईश्वर बाहर नही हमारे अंदर ही हैं। 


✍🏻सच्चा प्यार और ईश्वर एक तरह होते हैं मिल जाने पर और कोई ख्वाहिश नही रहती हैं। 


✍🏻स्वर्ग और नर्क सिर्फ हमारे दिमाग में हैं, मनुष्य अपने कर्मो का फल इसी पृथ्वी पर पाता हैं। 


✍🏻कर्म में विश्वास करना, खुद पर विश्वास करना और खुद पर विश्वास करना ईश्वर पर विश्वास करना होता हैं। 


✍🏻माता-पिता की सेवा ईश्वर की सेवा के बराबर होता हैं।
✍🏻ईश्वर के प्रति भक्ति भाव रखना और अच्छे कार्य को करना हमे मानसिक शांति देता हैं। 


✍🏻यदि आप यह मानते है कि आपके अंदर ईश्वर का अंश है तो आप किसी भी असम्भव कार्य को कर सकते हैं। 


✍🏻प्रकृति से प्रेम करना ईश्वर से प्रेम करने के बराबर होते हैं, यही ईश्वर का सच्चा रूप हैं। 


✍🏻मौन प्रार्थनाएँ जल्दी पहुँचती हैं भगवान् तक क्योकि ये शब्दों के बोझ से मुक्त होती हैं। 


✍🏻सुख में धर्म कार्य और दूसरो की मदद जरूर करनी चाहिए क्योकि बुरे समय में यही काम आता हैं। 


✍🏻जब आप एकदम अकेला महसूस करते हैं तब भी आपके साथ ईश्वर होते हैं। 


✍🏻स्वर्ग की कामना रखने वाले लोग कभी मोक्ष नही प्राप्त कर सकते हैं। 


✍🏻भगवान के अस्तित्व को मानने से आत्मबल मिलता हैं।
ईश्वर भक्ति से मन के विकार समाप्त हो जाते हैं और हम भगवान की समीप पहुँच जाते हैं। ✍🏻जब तक आप स्वयं पर विश्वास नही करते, तब तक आप ईश्वर पर भी विश्वास नही कर सकते हैं। 


✍🏻कर्म का अधिकार मनुष्य के पास है लेकिन फल ईश्वर देते हैं, इसलिए कर्म को सच्चे मन से करना चाहिए क्योकि मनुष्य के जीवन में उसके कर्मो का फल ही घटित होता हैं। 


✍🏻जब ईश्वर मनुष्य की परीक्षा लेते हैं तब वो मनुष्य का सामर्थ्य भी बढ़ा देते हैं ताकि वो अधिक बुद्धिमान और अधिक ताकतवर बनें। 


✍🏻अगर आपकी समस्या एक जहाज जितनी बड़ी है तो यह नही भूलना चाहिए कि भगवान की कृपा सागर जितनी विशाल हैं। 


✍🏻सच्चा प्रेम और भगवान एक जैसे ही होते हैं जिसके बारें में बातें सब करते हैं लेकिन महसूस बहुत कम ही लोग करते हैं। 


✍🏻जिसका मन सच्चा और कर्म अच्छा हैं वही भगवान का सच्चा भक्त हैं और ऐसे लोगो पर ईश्वर की कृपा हमेशा बनी रहती हैं। 


✍🏻भगवान न दिखाई देने वाले माता-पिता हैं और माता-पिता दिखाई देने वाले भगवान् हैं। 


✍🏻ईश्वर का सन्देश – सोने से पहले तुम सबको माफ़ कर दिया करो और तुम्हारे जागने से पहले मैं तुम्हें माफ़ कर दूँगा। 


✍🏻जब हम गेहूँ का एक दाना बोते हैं तो कुछ समय पश्चात वो हमे हजार दाने के रूप में मिलता हैं उसी तरह हमारे अच्छे कर्मो का फल हमें ईश्वर भी देता हैं। 


✍🏻मेरे और भगवान के बीच में बहुत ही ख़ूबसूरत रिश्ता हैं, मैं ज्यादा माँगता नही और वे कम देते नही हैं। 


✍🏻पूरी दुनिया में ढूढ़ने के बाद भी नही मिलता हैं वही माया हैं और जो एक जगह पर बैठे ही मिल जाए वही परमात्मा हैं। 


✍🏻भगवान का भक्त होने का मतलब यह नही कि आप कभी भी गिरेंगे नही, पर जब आप गिरेंगे तो भगवान आपकी स्वयं थाम लेंगे। 


✍🏻यदि आपके पास सिर्फ भगवान हैं तो आपके पास वह सब हैं जो आपको चाहिए। 


✍🏻हे भगवान, सुख देना तो बस इतना देना कि जिसमें अहंकार न आये और दुःख देना तो बस इतना कि जिसमें आस्था ना टूटे।


✍🏻वो तैराक भी डूब जाते हैं जिनको ख़ुद पर गुमान होता हैं और वो गँवार भी डूबते-डूबते पार हो जाते हैं जिनपर भगवान मेहरबान होते हैं।
✍🏻सच्चे मन से ही की गई प्रार्थना भगवान तक पहुँचती हैं। 


✍🏻श्रद्धा का मतलब हैं आत्मविश्वास और आत्मविश्वास का मतलब हैं ईश्वर में विश्वास। 


✍🏻जो मनुष्य जीवन में सत्य के मार्ग पर चलता हैं, उसका सफ़र ईश्वर के पास आके ही समाप्त होता हैं।

सतसंग बड़ा है या तप

एक बार महर्षि वशिष्ठजी और विश्वामित्रजी में बहस छिड़ गयी की सत्संग की महिमा बड़ी है या तप की महिमा। वशिष्ठजी का कहना था सत्संग की महिमा बड़ी है तथा विश्वामित्रजी का कहना था कि तप का महात्म्य बड़ा है

जब फैसला न हो सका तो दोनों विष्णु भगवान के पास पहुंचे और अपनी अपनी बात कही। विष्णु भगवान ने सोचा की दोनों ही महर्षि है और दोनों ही अपनी-अपन हैं

श्री हरि ने कहा कि इसका सही उत्तर तो एक लिंगनाथजी ही दे सकते है। अतः दोनों कैलाश पर शंकर भगवान के पास पहुंचे। शंकरजी के सामने भी यही समस्या आई। उन्होंने कहा कि मेरे मस्तक पर इस समय जटाजूट का भार है, अतः मैं सही निर्णय नहीं कर पाउँगा। आप भगवान शेषनाग के पास जाये वो ही सही फैसला कर सकेंगे

दोनों महर्षि शेषनाग के पास पहुंचे और अपनी बात उनसे कही, शेषनागजी ने कहा कि ऋषिवर! मेरे सिर पर धरती का भार है। आप थोड़ी देर के लिए मेरे सिर से धरती को हटा दे तो में फैसला कर दूँ

विश्वामित्रजी ने कहा कि धरती माता! तुम शेषनागजी के सर से थोड़ी देर के लिए अलग हो जाओ, मैं अपने तप का चौथाई फल आपको देता हूँ। पृथ्वी में कोई हलचल नहीं हुई तो फिर उन्होंने कहा कि तप का आधा फल समर्पित करता हूँ

इतना कहने पर भी धरती हिली तक नहीं। अंत में उन्होंने कहा कि में अपने सम्पूर्ण जीवन के तप का फल तुम्हे देता हूँ। धरती थोड़ी हिली, हलचल हुई फिर स्थिर हो गयी

अब वशिष्ठजी की बारी आई। उन्होंने कहा कि धरती माता! अपने सत्संग का निमिष मात्र फल देता हूँ, तुम शेषनाग के मस्तक से हट जाओ

धरती हिली, गर्जन हुआ और वो सर से उतरकर अलग खड़ी हो गई, शेषनागजी ने ऋषियों से कहा कि आप लोग स्वयं ही फेसला करले कि सत्संग बड़ा है या तप

इसलिये कहा गया है
जिसको जीवन मे मिला सत्संग है
उसे हर घडी आनन्द ही आनन्द है

सोया भाग्य

एक व्यक्ति जीवन से हर प्रकार से निराश था । लोग उसे मनहूस के नाम से बुलाते थे

एक ज्ञानी पंडित ने उसे बताया कि तेरा भाग्य फलां पर्वत पर सोया हुआ है , तू उसे जाकर जगा ले तो भाग्य तेरे साथ हो जाएगा
बस ! फिर क्या था वो चल पड़ा अपना सोया भाग्य जगाने
रास्ते में जंगल पड़ा तो एक शेर उसे खाने को लपका , वो बोला भाई ! मुझे मत खाओ , मैं अपना सोया भाग्य जगाने जा रहा हूँ
शेर ने कहा कि तुम्हारा भाग्य जाग जाये तो मेरी एक समस्या है , उसका समाधान पूछते लाना


मेरी समस्या ये है कि मैं कितना भी खाऊं …मेरा पेट भरता ही नहीं है , हर समय पेट भूख की ज्वाला से जलता रहता है..मनहूस ने कहा– ठीक है
आगे जाने पर एक किसान के घर उसने रात बिताई । बातों – बातों में पता चलने पर कि वो अपना सोया भाग्य जगाने जा रहा है


किसान ने कहा कि मेरा भी एक सवाल है .. अपने भाग्य से पूछकर उसका समाधान लेते आन...


मेरे खेत में,मैं कितनी भी मेहनत कर लूँ पैदावार अच्छी होती ही नहीं ।मेरी शादी योग्य एक कन्या है, उसका विवाह इन परिस्थितियों में मैं कैसे कर
पाऊंगा ?*


मनहूस बोला — ठीक है । और आगे जाने पर वो एक राजा के घर मेहमान बना । रात्री भोज के उपरान्त राजा ने ये जानने पर कि वो अपने भाग्य को जगाने जा रहा है , उससे कहा कि मेरी परेशानी का हल भी अपने भाग्य से पूछते आना


मेरी परेशानी ये है कि कितनी भी समझदारी से राज्य चलाऊं… मेरे राज्य में अराजकता का बोलबाला ही बना रहता है


मनहूस ने उससे भी कहा — ठीक है । अब वो पर्वत के पास पहुँच चुका था । वहां पर उसने अपने सोये भाग्य को झिंझोड़ कर जगाया— उठो ! उठो ! मैं तुम्हें जगाने आया हूँ


उसके भाग्य ने एक अंगडाई ली और उसके साथ चल दिया । उसका भाग्य बोला — अब मैं तुम्हारे साथ हरदम रहूँगा।


अब वो मनहूस न रह गया था बल्कि भाग्य शाली व्यक्ति बन गया था और अपने भाग्य की बदौलत वो सारे सवालों के जवाब जानता था।


वापसी यात्रा में वो उसी राजा का मेहमान बना और राजा की परेशानी का हल बताते हुए वो बोला चूँकि तुम एक स्त्री हो और पुरुष वेश में रहकर राज – काज संभालती हो , इसीलिए राज्य में अराजकता का बोल बाला है
तुम किसी योग्य पुरुष के साथ विवाह कर लो , दोनों मिलकर राज्य का भार संभालो तो तुम्हारे राज्य में शांति स्थापित हो जाएगी


रानी बोली — तुम्हीं मुझ से ब्याह कर लो और यहीं रह जाओ। भाग्य शाली बन चुका वो मनहूस इन्कार करते हुए बोला

नहीं नहीं ! मेरा तो भाग्य जाग चुका है । तुम किसी और से विवाह कर लो
तब रानी ने अपने मंत्री से विवाह किया और सुखपूर्वक राज्य चलाने लगी |
कुछ दिन राजकीय मेहमान बनने के बाद उसने वहां से विदा ली।
चलते चलते वो किसान के घर पहुंचा और उसके सवाल के जवाब में बताया कि तुम्हारे खेत में सात कलश हीरे जवाहरात के गड़े हैं
उस खजाने को निकाल लेने पर तुम्हारी जमीन उपजाऊ हो जाएगी और उस धन से तुम अपनी बेटी का ब्याह भी धूमधाम से कर सकोगे।
किसान ने अनुग्रहित होते हुए उससे कहा कि मैं तुम्हारा शुक्रगुजार हूँ , तुम ही मेरी बेटी के साथ ब्याह कर लो


पर भाग्य शाली बन चुका वह व्यक्ति बोला कि नहीं ! नहीं ! मेरा तो भाग्योदय हो चुका है , तुम कहीं और अपनी सुन्दर कन्या का विवाह करो।
किसान ने उचित वर देखकर अपनी कन्या का विवाह किया और सुखपूर्वक रहने लगा।


कुछ दिन किसान की मेहमान नवाजी भोगने के बाद वो जंगल में पहुंचा और शेर से उसकी समस्या के समाधान स्वरुप कहा कि यदि तुम किसी बड़े मूर्ख को खा लोगे तो तुम्हारी ये क्षुधा शांत हो जाएगी


शेर ने उसकी बड़ी आवभगत की और यात्रा का पूरा हाल जाना
सारी बात पता चलने के बाद शेर ने कहा कि भाग्योदय होने के बाद इतने अच्छे और बड़े दो मौके गंवाने वाले ऐ इंसान! तुझसे बड़ा मूर्ख और कौन होगा ? तुझे खाकर ही मेरी भूख शांत होगी..और इस तरह वो इंसान शेर का शिकार बनकर मृत्यु को प्राप्त हुआ


यदि आपके पास सही मौका परखने का विवेक और अवसर को पकड़ लेने का ज्ञान नहीं है तो भाग्य भी आपके साथ आकर आपका कुछ भला नहीं कर सकता है|🙏🙏🙏🙏