Tuesday, September 5, 2017

खुश रहना बहुत कठिन तो नहीं

एक संत से एक युवक ने पूछा:-
“ गुरुदेव, हमेशा खुश रहने का नुस्खा अगर हो तो दीजिए।"

संत बोले:-
 "बिल्कुल है,
आज तुमको वह राज बताता हूँ।"

संत उस युवक को अपने साथ सैर को ले चले,
अच्छी बातें करते रहे,
युवक बड़ा आनंदित था।
एक स्थान पर ठहर कर संत ने उस युवक को एक बड़ा पत्थर देकर कहा:-
" इसे उठाए साथ चलो। "

पत्थर को उठाकर वह युवक संत के साथ-साथ चलने लगा।
कुछ समय तक तो आराम से चला..
लेकिन थोड़ी देर में हाथ में दर्द होने लगा..
पर दर्द सहन करता चुपचाप चलता रहा।
संत पहले की तरह मधुर उपदेश देते चल रहे थे..
पर युवक का धैर्य जवाब दे गया।

उस युवक ने कहा:- " गुरूजी
आपके प्रवचन मुझे प्रिय नहीं लग रहे अब..
मेरा हाथ दर्द से फटा जा रहा है।"

पत्थर रखने का संकेत मिला तो उस युवक ने पत्थर को फेंका..
और आनंद में भरकर गहरी साँसे लेने लगा।

संत ने कहा:-
"यही है खुश रहने का राज़..

 मेरे प्रवचन तुम्हें तभी आनंदित करते रहे जब तुम बोझ से मुक्त थे,
परंतु पत्थर के बोझ ने उस आनंद को छीन लिया।
 जैसे पत्थर को ज़्यादा देर उठाये रखेंगे तो दर्द बढ़ता जायेगा..
उसी तरह हम दुखों या किसी की कही कड़वी बात के बोझ को जितनी देर तक उठाये रखेंगे उतना ही दुःख होगा।

🙏🏻 अगर खुश रहना चाहते हो तो दु:ख रुपी पत्थर को जल्दी से जल्दी नीचे रखना सीख लो और हो सके तो उसे उठाओ ही नहीं।

सुख-दुःख किसे कहते हैं और इनकी निवृत्ति कैसे हो ?

सुख दुख अपने मन के स्थिति पर निर्भर है

प्रश्न‒सुख-दुःख किसे  कहते हैं और इनकी निवृत्ति कैसे हो ?

उत्तर‒देखो, एक मार्मिक बात है कि वास्तव में सुख-दुःख हैं नहीं । हमारे मनके अनुकूल हो जाय तो सुख हो गया और मन के विरुद्ध हो गया तो दुःख हो गया । बाकी कुछ है नहीं सुख-दुःख ! ये हमारे बनाये हुए हैं । एक कुम्हार था, उसके दो लड़कियाँ थीं । उन दोनों का पासके गाँव में विवाह कर दिया था । एक लड़की के खेती का काम था और दूसरी के मिट्टी के बर्तन का काम था । एक दिन कुम्हार लड़कियों से मिलने के लिये गया । पूछा, ‘बेटी, क्या हाल चाल है ?’ ‘पिताजी, खेती सूख रही है । अगर पाँच-दस दिनों में वर्षा नहीं हुई तो फिर कुछ नहीं होगा ।’ दूसरी लड़की के यहाँ गया और पूछा तो वह कहने लगी ‘पिताजी ! बर्तन बनाकर सूखने के लिये रखे हैं, अगर दस-पन्द्रह दिन में वर्षा हो गयी तो सब मिट्टी हो जायगी ।’अब रामजी क्या करें बताओ ? एक के वर्षा होने से सुख है और एक के वर्षा होने से दुःख है । जिसके वर्षा होनेसे सुख है उसके वर्षा न होने से दुःख है तो यह सुख-दुःख अपने बनाये हुए हैं । वर्षा हो जाय अथवा वर्षा न हो‒यह हमारे हाथ की बात तो है नहीं । फिर क्यों सुखी-दुःखी होते हो? जो हो जाय, उसमें प्रसन्न रहो । जो होना होगा, वह होकर रहेगा ।

राम ब्रम्हतत्व की महिमा

ऐसी बात नहीं है कि अवधपुरी में राजा दशरथ के घर श्रीराम अवतरित हुए तब से ही लोग श्रीराम का भजन करते हैं। नहीं, नहीं, राजा दिलीप, राजा रघु एवं राजा दशरथ के पिता राजा अज भी श्रीराम का ही भजन करते थे क्योंकि श्रीराम केवल दशरथ के पुत्र ही नहीं हैं, बल्कि रोम-रोम में जो चेतना व्याप्त रही है, रोम-रोम में जो रम रहा है उसका ही नाम है 'राम'। राम जी के अवतरण से हजारों-लाखों वर्ष पहले राम नाम की महिमा वेदों में पायी जाती है।
रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः।
'जिसमें योगी लोगों का मन रमण करता है उसी को कहते हैं 'राम'।'

एक राम घट-घट में बोले,
दूजो राम दशरथ घर डोले।
तीसरे राम का सकल पसारा,
ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।

शिष्य ने कहाः "गुरुजी ! आपके कथनानुसार तो चार राम हुए। ऐसा कैसे ?"
गुरूः "थोड़ी साधना कर, जप-ध्यानादि कर, फिर समझ में आ जायेगा।" साधना करके शिष्य की बुद्धि सूक्ष्म हुई, तब गुरु ने कहाः

जीव राम घट-घट में बोले।
ईश राम दशरथ घर डोले।
बिंदु राम का सकल पसारा।
ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।

शिष्य बोलाः "गुरुदेव ! जीव, ईश, बिंदु व ब्रह्म इस प्रकार भी तो राम चार ही हुए न ?"
गुरु ने देखा कि साधना आदि करके इसकी मति थोड़ी सूक्ष्म तो हुई है। किंतु अभी तक चार राम दिख रहे हैं। गुरु ने करूणा करके समझाया कि "वत्स ! देख, घड़े में आया हुआ आकाश, मठ में आया हुआ आकाश, मेघ में आया हुआ आकाश और उससे अलग व्यापक आकाश, ये चार दिखते हैं। अगर तीनों उपाधियों – घट, मठ, और मेघ को हटा दो तो चारों में आकाश तो एक-का-एक ही है। इसी प्रकारः

वही राम घट-घट में बोले।
वही राम दशरथ घर डोले।
उसी राम का सकल पसारा।
वही राम है सबसे न्यारा।।

रोम-रोम में रमने वाला चैतन्यतत्त्व वही का वही है और उसी का नाम है चैतन्य राम"
वे ही श्रीराम जिस दिन दशरथ-कौशल्या के घर साकार रूप में अवतरित हुए, उस दिन को भारतवासी श्रीरामनवमी के पावन पर्व के रूप में मनाते हैं।
कैसे हैं वे श्रीराम ? भगवान श्रीराम नित्य कैवल्य ज्ञान में विचरण करते थे। वे आदर्श पुत्र, आदर्श शिष्य, आदर्श मित्र एवं आदर्श शत्रु थे। आदर्श शत्रु ! हाँ, आदर्श शत्रु थे, तभी तो शत्रु भी उनकी प्रशंसा किये बिना न रह सके। कथा आती है कि लक्ष्मण जी के द्वारा मारे गये मेघनाद की दाहिनी भुजा सती सुलोचना के समीप जा गिरी। सुलोचना ने कहाः 'अगर यह मेरे पति की भुजा है तो हस्ताक्षर करके इस बात को प्रमाणित कर दे।' कटी भुजा ने हस्ताक्षर करके सच्चाई स्पष्ट कर दी। सुलोचना ने निश्चय किया कि 'मुझे अब सती हो जाना चाहिए।' किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था। फिर वह कैसे सती होती ! जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा, तब रावण ने उत्तर दियाः "देवी ! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो। जिस समाज में बालब्रह्मचारी श्रीहनुमान, परम जितेन्द्रिय श्री लक्ष्मण तथा एकपत्नीव्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हैं, उस समाज में तुम्हें जाने से डरना नहीं चाहिए। मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य महापुरुषों के द्वारा तुम निराश नहीं लौटायी जाओगी।"
जब रावण सुलोचना से ये बातें कह रहा था, उस समय कुछ मंत्री भी उसके पास बैठे थे। उन लोगों ने कहाः "जिनकी पत्नी को आपने बंदिनी बनाकर अशोक वाटिका में रख छोड़ा है, उनके पास आपकी बहू का जाना कहाँ तक उचित है ? यदि यह गयी तो क्या सुरक्षित वापस लौट सकेगी ?"
यह सुनकर रावण बोलाः "मंत्रियो ! लगता है तुम्हारी बुद्धि विनष्ट हो गयी है। अरे ! यह तो रावण का काम है जो दूसरे की स्त्री को अपने घर में बंदिनी बनाकर रख सकता है, राम का नहीं।"

धन्य है श्रीराम का दिव्य चरित्र, जिसका विश्वास शत्रु भी करता है और प्रशंसा करते थकता नहीं ! प्रभु श्रीराम का पावन चरित्र दिव्य होते हुए भी इतना सहज सरल है कि मनुष्य चाहे तो अपने जीवन में भी उसका अनुसरण कर सकता है!
.................. जय सिया राम जी ..............

सियावर रामचन्द्र की जय

 पवनसुत हनुमान की जय
  राधे राधे

Parvchan His Holiness Satguru Mata Savinder Hardev Ji Maharaj (20 August, 2017, Delhi)

सतगुरु माता सविंदर हरदेव जी महाराज के प्रवचन (20-अगस्त-17, दिल्ली)

प्यारी साध संगत जी प्यार से कहना धन निरंकार जी

1) कुछ वर्ष पहले बाबा जी ने कवि दरबार में एक समस्या दी थी -
'विश्वास ही इंसान है, विश्वास ही भगवान है।'

बाबाजी ने हमेशा यही समझाया -
'जितना निरंकार पे हमारा विश्वास बढ़ता है, उतने ही हम पूर्ण गुरसिख बन पाते हैं।'

ज्यों-ज्यों हम इसके प्रति समर्पित होते हैं, त्यों-त्यों हमारे अंदर एक Positivity की भावना आती है, Positive हम बनते जाते हैं।

2) आप Nature में ही देख लीजिए। एक Catepillar समर्पित होता है और कितना सुंदर एक तितली का रूप ले लेता है। जब वो एक Cocoon की form में होता है, उसके इर्द-गिर्द सिर्फ अंधेरा होता है, उसको ये नहीं पता होता कि मेरा future क्या है, वो सिर्फ surrender ही करता है।

3) इसी के साथ वो Godfidence वाला word भी ध्यान में आ गया। संत-महापुरुष अपने पे Confidence नहीं, इस निरंकार की Godfidence पे विश्वास रखते हैं क्योंकि  वह जानते हैं इस निरंकार को पता है, हमारी बेहतरी किसमें है, हमारी भलाई किसमें है।

4) कुछ दिन पहले वो lines पढ़ने को मिली कि-
धोखा खाने वाला तो संभल जाता है पर धोखा देने वाला संभल नहीं पाता क्योंकि उसके अंदर एक guilty conscious की feeling रहती है।

5) पर महापुरुष हमेशा समर्पित भाव में ही रहते हैं, इसलिए उनके अंदर एक Peace of Mind होता है।
और ये Peace of Mind निरंकार के साथ पूरी तरह से जुड़ने से ही आता है और वो महापुरुष अपने इस विश्वास और इस Godfidence के साथ हमेशा निरंकार के साथ जुड़े रहते हैं और एक Peaceful जिंदगी व्यतीत कर पाते हैं।

साध संगत जी प्यार से कहना धन निरंकार जी।

पतंग सी है जिंदगी, कहाँ तक जाएगी...!

पतंग सी है जिंदगी, कहाँ तक जाएगी...!
रात हो या उम्र, एक न एक दिन कट ही जाएगी...!!


सही तो है,,,,,जीवन भी पतंग की तरह ही है,हवा (हालात) अनुकूल है तो बहुत ऊपर तक जाती है जीवन की पतंग और नही है तो बहुत मेहनत करनी पड़ती है,लेकिन जिस पतंग को मेरा सतगुरू दीन दयाल उड़ाता है वो आसमान को छूती है,सतगुरु के हाथ मे अपनी जीवन डोर देने से सभी विकारों के पतंग अपने आप कटते जातें हैं और ऐसे जीवन की पतंग हमेशा ऊंचाइयों को हासिल करती है,बस जरूरत है ये जीवन की डोर सतगुरु के हाथों में देने की यानी पूर्ण समर्पण करने की जिसने की वो निहाल हो जाता है।रहमत करो आशीष देओ सतगुरु की सिखलाई और आप संतजानो के चरणों से सीखते हुए प्रेम से रहना आ जाए,सबका आदर सत्कार करना आ जाए,सभी से मिलवर्तन वाला भाव हो मन में,सभी के गुण ही देखें,और सीखते जाएं यही अरदास कामना जी,,,,इस जीवन की पतंग कटने से पहले गुरुमत के आसमान में उड़ती रहे यही मांग यही प्रार्थना है जी।

  🙏🌷धन निरंकार जी🌷🙏

आओ एक मुलाक़ात जरा आईने से भी कर लें...

बहुत कमियां निकालते हैं हम दूसरों में अक्सर,
आओ एक मुलाक़ात जरा आईने से भी कर लें...

इंसान की फितरत है ये,,,,और आदत बनी हुई है,कमियां निकालने की,दुसरो के अवगुण देखने की दूसरों को अपने से नीचा देखने की,और यही कारण है कि आज संसार मे वैर नफरत ईर्ष्या बढ़ती जा रही है।जानते सब है कि हम सब एक परमपिता परमात्मा की संतान है लेकिन अज्ञानता के कारण अपने आप से ही विमुख हैं,जरूरत है अपने सुधार की लेकिन सुधरने का ज्ञान औरों को देते हैं,किरपा करो हमेशा अपने अवगुण को देखें और उनको सुधारें,दूसरों के गुणों पर ही नजर जाए और उन गुणों को अपने जीवन मे डालकर अपना भी कल्याण करें और सतगुरु की रहमत के पात्र बने यही अरदास कामना जी।

       🙏🏻 धन निरंकार जी 🙏🏻

Spiritual Story

एक औरत ने तीन संतों को अपने घर के सामने
देखा। वह उन्हें जानती नहीं थी।

औरत ने कहा –
“कृपया भीतर आइये और भोजन करिए।”

संत बोले – “क्या तुम्हारे पति घर पर हैं?”

औरत – “नहीं, वे अभी बाहर गए हैं।”

संत –“हम तभी भीतर आयेंगे जब वह घर पर
हों।”

शाम को उस औरत का पति घर आया और
औरत ने उसे यह सब बताया।

पति – “जाओ और उनसे कहो कि मैं घर
आ गया हूँ और उनको आदर सहित बुलाओ।”

औरत बाहर गई और उनको भीतर आने के
लिए कहा।

संत बोले – “हम सब किसी भी घर में एक साथ
नहीं जाते।”

“पर क्यों?” – औरत ने पूछा।

उनमें से एक संत ने कहा – “मेरा नाम धन है”

फ़िर दूसरे संतों की ओर इशारा कर के कहा –
“इन दोनों के नाम सफलता और प्रेम हैं।

हममें से कोई एक ही भीतर आ सकता है।

आप घर के अन्य सदस्यों से मिलकर तय कर
लें कि भीतर किसे निमंत्रित करना है।”

औरत ने भीतर जाकर अपने पति को यह सब
बताया।

उसका पति बहुत प्रसन्न हो गया और

बोला –“यदि ऐसा है तो हमें धन को आमंत्रित
करना चाहिए।
हमारा घर खुशियों से भर जाएगा।”

पत्नी – “मुझे लगता है कि हमें सफलता को
आमंत्रित करना चाहिए।”

उनकी बेटी दूसरे कमरे से यह सब सुन रही थी।
वह उनके पास आई और बोली –
“मुझे लगता है कि हमें प्रेम को आमंत्रित करना
चाहिए। प्रेम से बढ़कर कुछ भी नहीं हैं।”

“तुम ठीक कहती हो, हमें प्रेम
को ही बुलाना चाहिए” – उसके माता-पिता ने
कहा।

औरत घर के बाहर गई और उसने संतों से पूछा –
“आप में से जिनका नाम प्रेम है वे कृपया घर में
प्रवेश कर भोजन गृहण करें।”

प्रेम घर की ओर बढ़ चले।

बाकी के दो संत भी उनके
पीछे चलने लगे।

औरत ने आश्चर्य से उन दोनों से पूछा –
“मैंने
तो सिर्फ़ प्रेम को आमंत्रित किया था। आप लोग
भीतर क्यों जा रहे हैं?”

उनमें से एक ने कहा – “यदि आपने धन और
सफलता में से किसी एक को आमंत्रित किया होता
तो केवल वही भीतर जाता।

आपने प्रेम को आमंत्रित किया है।

प्रेम कभी अकेला नहीं जाता।
प्रेम जहाँ-जहाँ जाता है, धन और सफलता
उसके पीछे जाते हैं।

इस कहानी को एक बार, 2 बार, 3 बार
पढ़ें ........

अच्छा लगे तो प्रेम के साथ रहें, 💖💖

प्रेम बाटें, प्रेम दें और प्रेम लें

क्यों कि प्रेम ही
सफल जीवन का राज है। :)

कोई तन दुखी,कोई मन दुखी, कोई धन बिन रहत उदास। थोड़े थोड़े सब दुखी, सुखी मेरे सतगुरू के दास।

कोई तन दुखी,कोई मन दुखी,
कोई धन बिन रहत उदास।
थोड़े थोड़े सब दुखी,
सुखी मेरे सतगुरू के दास।

दुनिया मे सब तरह के भौतिक पदार्थ हैं हर प्रकार की सुख सुविधा के लिए फिर भी इंसान दुखी है,अपने तन को लेकर,अपने मन से विचलित होकर, तो कोई धन की कमी या लोभ की वजह से,लेकिन सबसे सुखी वही है जिसके पास सतगुरु की रहमत है,सतगुरू का दिया हुआ अनमोल तोहफा ये ब्रह्मज्ञान है,और निरंकार का दिया हुआ सिमरन है।सतगुरु से इस हरी का नामधन पाकर सब दुख कष्ट दूर भाग जाते हैं और केवल इस निरंकार हरी का शुकराना करने वाले भाव बनते चले जाते हैं,जिस से ये मन केवल इसकी रजा में रहता है और हमेशा हर हाल में आनंद की अनुभति करता रहता है।क्योंकि केवल हरी का नाम ही सुखदाई है इस संसार मे बाकी सब मोह माया है जो आज है कल नही होगी।एक हरी का नाम ही हमेशा रहेगा।

🙏 धन निरंकार जी 🙏