Tuesday, September 5, 2017

आजादी की मर्यादा

🌹✍ साध संगत जी संतो महापुरुषों का मत है कि दो किनारों के बीच बहता हुआ पानी सदा सुख देने वाला होता है । सभी की प्यास बुझाता है, खेतों में हरियाली लाता है, नाना प्रकार की खुशियां देता है, और अंत में अपने सागर में मिल करके सागर का रूप बन जाता है । अगर यही पानी अपने आप को दो किनारों से आजाद होकर के, दो किनारों से बाहर हो करके आजादी महसूस करता है, तो वह विनाशक का रूप बना लेता है, सभी की खुशियां छिन लेता है, लाखों घर बहा देता है, हानि का काम करता है दुख ही दुख देता है...

🌹✍ ठीक इसी प्रकार मानव जीवन का है । जब मानव मानवता से बाहर हो जाता है, तो दुख ही दुख देता है, दुख का कारण बनता है, विनाश का कारण बनता है । प्यार नम्रता सहनशीलता से कोसों दूर नफरत निंदा अहंकार से मानवता को मलिन कर देता है, और समाज और देश यहां तक की अपने आपका भी विनाश का कारण बनता है...

गुरसिख का आजादी की मर्यादा
 
🌹✍ साध संगत जी अक्सर हम यही सोचते हैं कि सतगुरु ने हमें आजाद कर दिया ब्रह्मज्ञान दे कर के, पर हमारी आजादी कहां तक है हम कहां तक आजाद है यह सोचने की बात है...

🌹✍ साध संगत जी सतगुरु ने सिर्फ हमें भक्ति करने के लिए आजाद किया है कि हम सब सभी में, सारे मानव और जीव में इस निराकार प्रभु को देख कर  भक्ति का भरपूर आनंद उठा पाए । क्योंकि भक्त तभी सफल होता है जब भक्त सभी में अपने परमात्मा प्रीतम को देखता है, तब वह भक्ति में आजादी महसूस करता हैं । भक्ति बंधन का चीज नहीं है कि दो टाइम या 3 टाइम ही सिमरन करना है । यहां तो सतगुरु ने आजाद कर दिया कि जब चाहो अपने प्रीतम प्रभु का अनुभव करो, अनुभूति करो, एहसास करो यह तो तुम्हारे अंग संग है..

🌹✍ साध संगत जी भक्ति तो रावण ने भी किया था पर वह भक्ति के दो किनारों से अलग होकर के गुरु वचनों को ना मानते हुए अपने मन की भक्ति करता हुआ जीवन जी रहा था । तो आप सभी ने देखा ही रावण जैसा ब्रह्मज्ञानी का क्या दशा हुआ । भक्ति तो हिरणकश्यप ने भी किया था, कंस ने भी किया था पर आप सभी ने उनकी हालात को बखूबी जानते हैं...

🌹✍ गुरसिख की आजादी की मर्यादा ज्ञान और कर्म के दो किनारों के बीच बहता हुआ जल के समान है । ज्ञान और कर्म के बीच जब गुरसिख दुनिया में अपना जीवन जीता है, तो वह सभी को ठंडक देता है, खुशियां देता है, और सृष्टि को भी सुंदर बनाता चला जाता है । गुरसिख अपने सतगुरु के रजा में सदा खुशहाल रहते हुए, आनंद की लहरों में सदा मस्त रहता है, खुशहाल रहता है..

 🌹✍ ब्रह्म ज्ञानी संत ज्ञान और कर्म के दो किनारों से जब ऊपर मन मति करने लगता है तो यहीं भक्त रावण कंस और हिरण्यकश्यप का रूप बन जाता है, और मानवता को हानि पहुंचाता है, और जहां प्यार नम्रता सहनशीलता लाने की बात करता था अब वहां पर निंदा चुगली अहंकार से दुनिया में आतंक फैलाने लगता है...

भक्ति तभी सफल होती है जब गुरसिख ज्ञान और कर्म रूपी दो किनारों के बीच सदा बहता रहे । और भक्ति का परम आनंद महसूस करता हुआ, अपने निरंकार प्रभु को सभी जीवो में, पूरी सृष्टि में देखते हुए, महसूस करते हुए, अपनी आखिरी सांस से अपने सतगुरु से तोड़ निभा जाए । ऐसे गुरसिख ही अपने निजी स्वरूप परमपिता परमात्मा रूपी सागर मे मिलकर के एकमीक हो जाता है, एक हो जाता है..

🙏 क्षमा याचना सहित 🙏
        धन निरंकार जी

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